सिद्रतुल मुन्तहा 0️⃣7️⃣

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*🥀 वाकिआए में'राज 🥀*



*🕋 07*

بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ
اَلصَّــلٰوةُ وَالسَّلَامُ عَلَيْكَ يَا رَسُوْلَ اللّٰه ﷺ
*सिद्रतुल मुन्तहा*
     सातवे आस्मान पर हज़रते इब्राहिम عليه السلام से मुलाक़ात के बाद आप ﷺ सिद्रतुल मुन्तहा के पास तशरीफ़ लाए। ये एक नूरानी बैरी का दरख्त है, जिस की जड़ छटे आस्मान पर और शाखे सातवे आस्मान के ऊपर है, इसके फल मक़ामे हजर के मटकों की तरह बड़े बड़े और पत्ते हाथी के कानों की तरह है। आप ﷺ न्र यहाँ चार नहरें मुलाहज़ा फ़रमाई जो सिद्रतुल मुन्तहा की जड़ से निकलती थी, इनमे से दो तो ज़ाहिर थी और दो खुफ्या। आप ने जिब्राइल से दरयाफ़्त फ़रमाया ये नहरें केसी है? अर्ज़ किया खुफ्या नहरें तो जन्नत की है और ज़ाहिरी नहरे निल और फुरात है।

*मक़ामे मुस्तवा*
     फिर आप ﷺ आगे बढ़े तो जिब्राइल वही ठहर गए और आगे जाने से माज़िरत ख्वाह हुवे। फिर आप ﷺ आगे बढ़े और बुलन्दी की तरफ सफर फ़रमाते हुवे एक मक़ाम पर तशरीफ़ लाए जिसे मुस्तवा कहा जाता है, यहाँ आप ने क़लमों की चर चराहट समाअत फ़रमाई। ये वो क़लम थे जिन से फ़रिश्ते रोज़ाना के अहकामे इलाहिय्या लिखते है और लोहे महफूज़ से एक साल के वाकिआत अलग अलग सहिफ़ो में नक़्ल करते है और फिर ये सहिफे शाबान की 15वी शब् मुताल्लुक़ हुक्काम फरिश्तों के हवाले कर दिये जाते है।

*अर्शे उला से भी ऊपर*
     फिर मुस्तवा से आगे बढ़े तो अर्श आया, आप ﷺ उससे भी ऊपर तशरीफ़ लाए और फिर वहां पहुचे जहाँ खुद "कहाँ" और "कब" भी खत्म हो चुके थे क्योंकि ये अलफ़ाज़ जगह और ज़माने के लिये बोले जाते है और जहाँ हमारे आक़ा ﷺ रौनक अफ़रोज़ हुवे वहां न जगह थी न ज़माना। इसी वजह से इसे ला मकां कहा जाता है।
     यहाँ अल्लाह ने औने प्यारे महबूब ﷺ को वो क़ुर्बे ख़ास अता फ़रमाया कि न किसी को मिला न मिले। हदीस में इस बयान के लिये क़ा-ब क़ौसेन के अल्फ़ाज़ इस्तिमाल किये गए है। जिन्हें उस वक़्त इस्तिमाल किया जाता है जब इन्तिहाई कुर्ब और नज़दीकी बताना मक़सूद होता है।

*दीदार इलाही और हम कलामी का शरफ*
     हुज़ूर ﷺ ने बेदारी की हालत में सर की आँखों से अपने प्यारे रब का दीदार किया कि न पर्दा था न कोई हिजाब, न ज़माना था न कोई मकान, न फ़रिश्ता था न कोई इंसान, और बे वासिता कलाम का शरफ भी हासिल किया।

बाक़ी अगली पोस्ट में..أن شاء الله


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