अल्लाह की क़ुदरत का बया1️⃣1️⃣
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*🥀 वाकिआए में'राज 🥀*
*🕋 11*
بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ
اَلصَّــلٰوةُ وَالسَّلَامُ عَلَيْكَ يَا رَسُوْلَ اللّٰه ﷺ
*अल्लाह की क़ुदरत का बयान*
अपनी पाकी का बयान फरमाने के बाद اٙسْرٰى का लफ्ज़ इर्शाद फ़रमाया जिस का मतलब है ले गया। गौर कीजिये अल्लाह ने हुज़ूर ﷺ को जाने वाला नहीं फ़रमाया बल्कि अपनी ज़ाते मुक़द्दस को ले जाने वाला फ़रमाया।
उलमा फ़रमाते है कि अल्लाह ने लफ्ज़ سبحان और اسرى फरमा कर मेराज जिस्मानी पर होने वाले हर एतिराज़ का जवाब दिया है, गोया यूँ फ़रमाया कि ऐ मुन्किरो! खबरदार! वाक़ीआए मेराज में मेरे हबीब पर एतिराज़ करने का तुम्हें कोई हक़ नहीं। इस लिये कि इन्होंने मेराज करने और मस्जिदे अक़्सा या आसमानों पर खुद जाने का दावा नहीं किया। ऐसी सूरत में तुम्हें इन पर एतिराज़ करने का क्या हक़ है? ये दावा तो मेरा है कि में अपने हबीब को ले गया। अब अगर मेरे ले जाने पर एतिराज़ है कि अल्लाह कैसे ले गया? ये ले जाना और ज़रा सी देर में आसमानों की सैर करा के वापस ले आना तो मुमकिन नहीं तो याद रखो कि में سبحان (हर इज्ज़ व कमज़ोरी से पाक) हूँ। जो चीज़ मख्लूक़ के लिये आदतन नामुमकिन और महाल है अगर मेरे लिये भी उसी तरह मुहाल और नामुमकिन हो तो में आजिज़ और नातुवां ठहरूँगा और आजिज़ी व नातुवानी ऐब है और में हर ऐब से पाक हूँ।
*मेराज जिस्मानी का सुबूत*
इस आयत से यह भी मालुम हुई कि हुज़ूर ﷺ की ये मेराज फ़क़त रूहानी न थी बल्कि जिस्म और रूह दोनों के साथ थी।
चुनान्चे आला हज़रत رحمة الله عليه इर्शाद फ़रमाते है कि मेराज शरीफ यक़ीनन क़तअन इसी जिस्मे मुबारक के साथ हुवा न कि फ़क़त रूहानी, जो उनके अता से उन के गुलामों को भी होता है, अल्लाह फ़रमाता है पाकी है उसे जो रात में ले गया अपने बन्दे को।
ये न फ़रमाया कि ले गया अपने बन्दे की रूह को।
*नोट*
याद रहे की मेराज शरीफ ब हालते बेदारी जिस्म व रूह दोनों के साथ वाकेंअ हुई, यही जमहुर अहले इस्लाम का अक़ीदा है और असहाबे रसूल की कसीर जमाअतें और हुज़ूर के अजिल्ला असहाब इसी के मोतकिद है।
*दूसरा मक़ाम*
सूरए बनी इसराइल में ही आयत 60 में है: और हम ने न किया वह दिखावा जो तुम्हें दिखाया था मगर लोगों की आज़माइश को।
मेराज की सुबह जब हुज़ूर ﷺ ने लोगों को इस बारे में बताया तो आप ﷺ पर ईमान लेन वाले बाज़ लोग मुर्तद हो गए, इस आयत में उन लोगों को आज़माइश में डाले जाने का ज़िक्र है।
इस आयत से भी यही पता चलता है की मेराज सिर्फ रूह को न हुई बल्कि जिस्म और रूह दोनों को हुई क्योंकि अगर हालते ख्वाब में फ़क़त रूह को मेराज होती तो किसी को एतराज़ न होता।
*तीसरा मक़ाम*
सूरए नज्म आयत 1 से 18 में है: इस प्यारे चमकते तारे मुहम्मद की क़सम! जब ये मेराज से उतरे तुम्हारे साहिब न बहके न बे राह चले और वो कोई बात अपनी ख्वाहिश से नहीं करते वो तो नहीं मगर वही जो उन्हें की जाती है उन्हें सिखाया सख्त कुव्वतों वाला ताक़तवर ने फिर उस जलवे ने क़स्द फ़रमाया और वो आसमाने बरी के सब से बुलन्द किनारे पर था फिर वो जल्वा नज़्दीक हुवा फिर खूब उतर आया तो उस जलवे और उस महबूब में दो हाथ का फ़ासिला रहा बल्कि इससे भी कम अब वही फ़रमाई अपने बन्दे को जो वही फ़रमाई दिल ने झूट न कहा जो देखा तो क्या तुम उनसे उनके देखे हुवे पर झगड़ते हो और उन्हों ने तो वो जल्वा दो बार देखा सिद्रतुल मुन्तहा के पास उस के पास जन्नतुल मावा है जब सिद्रा पर छा रहा था जो छा रहा था आँख न किसी तरफ फिरि न हद से बढ़ी बेशक अपने रब की बहुत बड़ी निशानियां देखीं।
इन आयत में नज्म (तारे) से क्या मुराद है इसकी तफ़सीर में बहुत से क़ौल है बाज़ ने सितारे मुराद लिये, बाज़ ने सितारों की एक खास किस्म सुरैया और बाज़ ने क़ुरआन मुराद लिया है। राजेह क़ौल यह है की इससे हुज़ूर ﷺ की ज़ात मुराद है।
बाक़ी अगली पोस्ट में..أن شاء الله
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*🏁 MASLAKE AALA HAZRAT 🔴*
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