अल्लाह की क़ुदरते कामिला1️⃣2️⃣

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*🥀 वाकिआए में'राज 🥀* 



*🕋 12*

بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ
اَلصَّــلٰوةُ وَالسَّلَامُ عَلَيْكَ يَا رَسُوْلَ اللّٰه ﷺ
*अल्लाह की क़ुदरते कामिला* #01
     ये अल्लाह की क़ुदरत है कि उसने रात के मुख़्तसर से हिस्से में अपने महबूब को बैतूल मुक़द्दस और फिर सातों आसमानों नीज़ अर्श व कुरसी से भी ऊपर ला मकां की सैर कराई, बाज़ नादान जो हर बात को अक़्ल के तराज़ू पर तोलने के आदी होते है ऐसे मुआमलात में भी अपनी नाक़ीस अक़्ल को दखल देते है, जब कुछ बन नहीं पड़ता तो मन घडत और बातिल ताविलों और हिलों बहानो से ख़ालिक़े काइनात अल्लाह की क़ुदरत के ही इनकारी हो जाते है।
     याद रखिये! अल्लाह हर शै पर क़ादिर है। ये ज़मीनो अस्मान, ये पहाड़ो समन्दर, ये चाँद सूरज, ये फासिले और ये सफर की मन्ज़िले सब कुछ उसी का पैदा किया हुवा है, वो जिसके लिये चाहे फासले समेट दे और जिसके लिये चाहे बढ़ा दे, अक़्ले इसका इहाता करने से क़ासिर है नीज़ उसने अपनी क़ुदरते कामिला से अपने प्यारे अम्बिया व रसूल عليه السلام को ऐसे बहुत से उमुर अता फरमाए है जो आदतन नामुमकिन व मुहाल होते है, ऐसे उमुर को मोजिज़ा कहा जाता है जैसे हज़रते मूसा عليه السلام के मुबारक असा (लाठी) का सांप बन जाना और ईसा عليه السلام का मुर्दो को ज़िन्दा करना और पैदाइशी अंधों को देखने वाला करना वगैरा, और सबसे अफ़्ज़ल नबी व रसूल हुज़ूर अहमदे मुज्तबा, मुहम्मदे मुस्तफा ﷺ को सबसे ज़्यादा मोजिज़ात अता फरमाए। बस हमें उस की क़ुदरत पर पुख्ता ईमान रखना चाहिये।

*अल्लाह की क़ुदरते कामिला* #02
     आसमाने हिदायत के रौशन सितारों हज़राते सहाबए किराम का अमल हमारे लिये बेहतरीन राहनुमा है, इन आली रुतबा हस्तियों ने कमो बेश ज़िन्दगी के हर शोबे में मिसालि किरदार अदा किया है और इससे बाद वालों के लिये एक बेहतरीन नमूना पेश किया है कि ख्वाह केसी ही हैरान कुन बात हो और कैसा ही हैरान अंगेज़ वाक़ीआ हो अल्लाह अल्लाह और उसके रसूल के फरामीन पर सिद्क़ दिल से ईमान लाना चाहिये।
     वाक़ीआए मेराज की तस्दीक़ में अफ़ज़लुस्सहाबा हज़रत अबू बक्र सिद्दीक़ رضي الله عنه का मुबारक अमल मुलाहज़ा कीजिये, लेकिन इससे पहले उस वक़्त के अहवाल बयान किये जाते है जिस वक़्त मक्का में हुज़ूर ﷺ ने मेराज का एलान फ़रमाया था लेकिन क़ुफ़्रो शिर्क की नफासत से आलूदा कुफ्फार अपने तरीके के मुताबिक़ इस के मानने से इनकारी हुवे थे।
     चुनान्चे रिवायत के मुताबिक़ मेराज की सुब्ह प्यारे आक़ा ﷺ सबसे अलग थलग हो कर किसी जगह तशरीफ़ फरमा थे और बहुत फ़िक्र मन्द थे कि लोग मेराज का वाक़ीआ सुन कर यक़ीन नहीं करेंगे। इतने में अबू जहल का वहां से गुज़र हुवा, जब उसने आप ﷺ को फ़िक्र मन्दी की हालत में बेठे देखा तो पास आ कर बेठ गया और معاذ الله मज़ाक उड़ाते हुवे कहने लगा: क्या कोई नई बात हो गई? आप ﷺ ने इर्शाद फ़रमाया हाँ। पूछा वो क्या? फ़रमाया: मुझे रात को सैर कराई गई। दरयाफ़्त किया कहाँ तक? फ़रमाया बैतूल मुक़द्दस तक।

बाक़ी अगली पोस्ट में..أن شاء الله



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