अज़ाबे इलाही से मुतअल्लिक़2️⃣5️⃣

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*🥀 वाकिआए में'राज 🥀* 



*🕋 25*

بِسْــــــمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِىْمِ
اَلصَّــلٰوةُ وَالسَّلَامُ عَلَيْكَ يَا رَسُوْلَ اللّٰه ﷺ
*अज़ाबे इलाही से मुतअल्लिक़* #05

*आग की कैंचियां*
     मेराज की रात हमारे आक़ा ﷺ कुछ और लोगों के पास तशरीफ़ ले गए, उनके होंठ आग की कैंचियों से काटे जा रहे थे और हर बार कांटने के बाद वो दुरुस्त हो जाते थे। जिब्राइल ने अर्ज़ किया ये आप की उम्मत के ख़ुत्बा है, ये अपने कहे पर अमल नहीं करते थे और क़ुरआन पढ़ते थे लेकिन इसपर अमल नहीं करते थे।
      इस रिवायत से उन मुबल्लीगिन और वाइज़िन को दर्स हासिल करना चाहिये जो दूसरों को तो नेकी की दावत देते है मगर खुद को भूले हुवे है। उन्हें इस बात का एहसास ही नहीं होता की बरोज़े क़यामत उनका भी मुहासबा होगा, उनसे भी उनके आमाल व अफआल के बारे में पूछा जाएगा।
     मुहम्मद बिन ग़ज़ाली رحمة الله عليه अपने एक शागिर्द को नसीहत करते हुवे फ़रमाते है: ऐ प्यारे बेटे! इल्म के बगैर अमल पागल पन और दीवानगी से कम नहीं और अमल बगैर इल्म के नामुमकिन है। जो इल्म आज तुझे गुनाहों से दूर नहीं कर सका और अल्लाह की इताअत का शौक़ पैदा न कर सका तो याद रख! ये कल तुझे जहन्नम की आग से भी नहीं बचा सकेगा। अगर आज तूने नेक अमल न किया और गुज़रे हुवे वक़्त का तदारुक न किया तो कल क़यामत में तेरी एक ही मुकार होगी: 
"हमें फिर भेज कि नेक काम करें हम को यक़ीन आ गया।"
السجدة ١٢
     तो तुझे जवाब दिया जाएगा: ऐ अहमक़ व नादान! तू वहीं से तो आ रहा है! 
     रूह में हिम्मत पैदा कर, नफ़्स के खिलाफ जिहाद कर और मौत को अपने क़रीब तर जान, क्योंकि तेरी मन्ज़िल क़ब्र है और क़बस्तान वाले हर लम्हा तेरे मुन्तज़िर है कि तू कब उन के पास पहुंचेगा? खबरदार! खबरदार! डर इस बात से की बगैर ज़ादे राह के तू उनके पास पहुंच जाए।

*अज़ाबे इलाही से मुतअल्लिक़* #06

*आग की शाखों से लटके हुवे लोग*
     मेराज की शब् हुज़ूर ﷺ ने दोज़ख में कुछ ऐसे लोग भी देखे जो आग की शाखों से लटके हुवे थे। जिब्राइल अर्ज़ किया: ये वो लोग है जो दुन्या में अपने वालिदैन को गलियां देते थे।
     याद रखिये! वालिदैन को सताना और उन्हें इज़ा पहुंचाना हराम और जहन्नम में ले जाने वाला काम है, अल्लाह ने क़ुरआन में वालिदैन को झिड़कने और उन्हें उफ़ तक कहने से मना फ़रमाया है।
"तो उनसे हूँ (उफ़ तक) न कहना और उन्हें न झिड़कना और उनसे ताज़ीम की बात कहना."
بنى اسراىٔيل، ٢٣
     वालिदैन की नाफ़रमानी व इज़ा रसानी की उखरवी सज़ा तो है ही, दुन्या में भी इब्रतनाक सज़ा भुगतनी पड़ती है, बारहा देखा गया है कि जो अपने वालिदैन को सताते और उन्हें तकलीफ पहुंचाते है खुद अपनी ही अवलाद के हाथो ज़लिलो रुस्वा हो कर ज़िन्दगी गुज़ारते है।
     फरमाने मुस्तफा ﷺ: हर गुनाह को अल्लाह जिस के लिये चाहता है बख्श देता है मगर वालिदैन की नाफ़रमानी व इज़ा रसानी को नहीं बख्शता बल्कि ऐसा करने वाले को उस के मरने से पहले दुन्या की ज़िन्दगी में जल्द ही सज़ा दे देता है।

बाक़ी अगली पोस्ट में..أن شاء الله


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*🏁 MASLAKE AALA HAZRAT 🔴*

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